एजेंसी और ठेका प्रथा खत्म कर श्रमिकों को स्थायी करे विश्वविद्यालय प्रशासन, भाकपा-माले की दोटूक

समस्तीपुर \पूसा। डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा में वर्षों से कार्यरत सैकड़ों श्रमिकों और रात्रि सुरक्षा प्रहरियों की रोजगार संबंधी असुरक्षा, मजदूरी में कथित कटौती और काम के सीमित दिनों को लेकर भाकपा-माले ने विश्वविद्यालय प्रशासन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। पार्टी ने विश्वविद्यालय परिसर में संचालित एजेंसी, ठेका और आउटसोर्सिंग व्यवस्था को समाप्त करने तथा पात्र श्रमिकों को स्थायी रोजगार देने की मांग उठाई है। भाकपा-माले जिला कमेटी के सदस्य रौशन कुमार ने कहा कि वर्षों से विश्वविद्यालय के विभिन्न विभागों और संस्थानों में काम करने वाले श्रमिकों को उनके श्रम के अनुरूप अधिकार और सुविधाएं मिलनी चाहिए।

उन्होंने विश्वविद्यालय प्रशासन से मांग की कि नियमित प्रकृति के कार्यों में लगे श्रमिकों की स्थिति पर गंभीरता से विचार किया जाए और उन्हें रोजगार की सुरक्षा प्रदान करने के लिए ठोस पहल की जाए। उनका कहना है कि विश्वविद्यालय के शैक्षणिक एवं प्रशासनिक भवनों, प्रयोगशालाओं, छात्रावासों, डेयरी फार्म, कृषि अनुसंधान प्रक्षेत्र तथा साफ-सफाई सहित कई महत्वपूर्ण कार्यों में श्रमिक लंबे समय से अपनी सेवाएं दे रहे हैं। इसके बावजूद उन्हें स्थायी रोजगार और पर्याप्त कार्य दिवस नहीं मिलने की शिकायतें सामने आ रही हैं।

वर्षों से सेवा देने वाले श्रमिकों को स्थायी करने की मांग

भाकपा-माले जिला कमेटी सदस्य रौशन कुमार ने कहा कि विश्वविद्यालय जैसे महत्वपूर्ण केंद्रीय शैक्षणिक संस्थान में श्रमिकों के योगदान को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। परिसर की साफ-सफाई से लेकर सुरक्षा व्यवस्था और कृषि अनुसंधान से जुड़े विभिन्न कार्यों के संचालन तक में श्रमिकों की अहम भूमिका रहती है। इन कर्मचारियों की मेहनत से ही विश्वविद्यालय की दैनिक गतिविधियां सुचारु रूप से संचालित होती हैं।

उन्होंने कहा कि लंबे समय से अपनी सेवाएं देने के बावजूद श्रमिकों को स्थायी रोजगार नहीं मिलना गंभीर चिंता का विषय है। एजेंसियों और ठेकेदारों के माध्यम से काम कराने की व्यवस्था के कारण श्रमिकों को रोजगार की अनिश्चितता का सामना करना पड़ता है। इससे उनके परिवारों की आर्थिक स्थिति और भविष्य की सुरक्षा पर भी असर पड़ता है।

रौशन कुमार ने विश्वविद्यालय प्रशासन से मांग की कि श्रमिकों की सेवा अवधि, उनके कार्यों की प्रकृति और लागू नियमों के आधार पर उनकी स्थिति की समीक्षा की जाए। उन्होंने नियमित प्रकृति के कार्यों में ठेका प्रथा समाप्त करने और नियमानुसार पात्र कर्मचारियों को स्थायी करने की दिशा में आवश्यक कदम उठाने की मांग की।

महीने में केवल 18 दिन काम देने पर जताई नाराजगी

श्रमिकों को मिलने वाले कार्य दिवसों पर सवाल उठाते हुए रौशन कुमार ने कहा कि लंबे समय से काम करने वाले कर्मचारियों को महीने में महज 18 दिन काम देने की व्यवस्था उनके लिए आर्थिक परेशानी पैदा करती है। उनके अनुसार, सीमित कार्य दिवसों के कारण श्रमिकों की आय प्रभावित होती है और परिवार का भरण-पोषण करना मुश्किल हो जाता है।

उन्होंने मांग की कि श्रमिकों को कम से कम 26 दिन काम उपलब्ध कराने की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए। साथ ही, संबंधित श्रम कानूनों, लागू नियमों और पात्रता के अनुसार सरकार द्वारा निर्धारित पूरी न्यूनतम मजदूरी का भुगतान किया जाए। उन्होंने कहा कि श्रमिकों को उनके काम के बदले उचित पारिश्रमिक मिलना चाहिए और मजदूरी से संबंधित किसी भी तरह की अनियमितता की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।

भाकपा-माले नेता ने कहा कि श्रमिक अपने परिवारों की आजीविका चलाने के लिए पूरी मेहनत से काम करते हैं। ऐसे में काम के दिनों में कटौती और मजदूरी से जुड़ी अनिश्चितता उनके सामने गंभीर चुनौतियां खड़ी करती है। विश्वविद्यालय प्रशासन को इन समस्याओं का समाधान प्राथमिकता के आधार पर करना चाहिए, ताकि श्रमिक सम्मानजनक तरीके से अपना जीवनयापन कर सकें।

एजेंसियों के भुगतान और मजदूरी का हिसाब सार्वजनिक करने की मांग

रौशन कुमार ने विश्वविद्यालय में काम कराने वाली विभिन्न एजेंसियों की भुगतान व्यवस्था पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि श्रमिकों की मजदूरी में भारी कटौती किए जाने की शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं। ऐसे में विश्वविद्यालय प्रशासन को यह स्पष्ट करना चाहिए कि संबंधित एजेंसियों को श्रमिकों की सेवाओं के बदले कुल कितनी राशि का भुगतान किया जाता है और वास्तविक रूप से श्रमिकों के हाथ में कितनी मजदूरी पहुंचती है।

उन्होंने इस पूरे मामले की उच्चस्तरीय और निष्पक्ष जांच कराने की मांग की। उनका कहना है कि एजेंसियों को किए जाने वाले भुगतान, श्रमिकों की उपस्थिति, निर्धारित मजदूरी और वास्तविक भुगतान का मिलान किया जाना चाहिए। इससे यह स्पष्ट हो सकेगा कि कहीं भुगतान में अनियमितता तो नहीं हो रही है।

भाकपा-माले नेता ने मांग की कि संबंधित अभिलेखों और भुगतान विवरण की जांच कराई जाए तथा नियमानुसार सार्वजनिक किए जा सकने वाले वित्तीय विवरणों को पारदर्शी बनाया जाए। यदि जांच में किसी प्रकार की अनियमितता सामने आती है, तो नियमानुसार जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए।

उन्होंने कहा कि श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए भुगतान प्रक्रिया में पारदर्शिता जरूरी है। विश्वविद्यालय प्रशासन को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि श्रमिकों के नाम पर एजेंसियों को दी जाने वाली राशि और कर्मचारियों को मिलने वाली मजदूरी के बीच किसी तरह की अनुचित कटौती न हो।

केंद्र और राज्य सरकार की भूमिका पर उठाए सवाल

रौशन कुमार ने केंद्र और राज्य सरकार की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा कि केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय जैसे महत्वपूर्ण संस्थान में काम करने वाले श्रमिकों को यदि रोजगार की असुरक्षा और मजदूरी संबंधी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है, तो यह गंभीर विषय है। उन्होंने कहा कि श्रमिकों के हितों की रक्षा के लिए संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों को प्रभावी कदम उठाने चाहिए।

उन्होंने जोर देकर कहा कि श्रमिकों को केवल काम करने वाले लोगों के रूप में नहीं, बल्कि संस्थान की व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा मानकर उनके अधिकारों और जरूरतों पर ध्यान दिया जाना चाहिए। नियमित काम करने वाले कर्मचारियों के लिए रोजगार की स्थिरता, समय पर मजदूरी और सामाजिक सुरक्षा जैसी सुविधाएं बेहद महत्वपूर्ण हैं।

भाकपा-माले ने यह भी मांग की कि विश्वविद्यालय परिसर में कार्यरत सभी पात्र श्रमिकों और सुरक्षा प्रहरियों को लागू नियमों के अनुसार सामाजिक सुरक्षा का पूरा लाभ दिया जाए। इसमें संबंधित प्रावधानों के तहत भविष्य निधि, कर्मचारी राज्य बीमा तथा अन्य देय सुविधाओं की उपलब्धता की जांच भी शामिल होनी चाहिए।

मांगें पूरी नहीं हुईं तो कुलपति के समक्ष होगा प्रदर्शन

भाकपा-माले जिला कमेटी सदस्य रौशन कुमार ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि विश्वविद्यालय प्रशासन ने श्रमिकों की समस्याओं पर शीघ्र सकारात्मक पहल नहीं की, तो पार्टी श्रमिकों को संगठित कर कुलपति के समक्ष जोरदार प्रदर्शन करेगी। उन्होंने कहा कि श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए आंदोलन को और तेज किया जाएगा।

उन्होंने विश्वविद्यालय प्रशासन से अपील की कि मामले को गंभीरता से लेते हुए श्रमिक प्रतिनिधियों के साथ बातचीत की जाए और उनकी समस्याओं के समाधान के लिए समयबद्ध पहल की जाए। उनका कहना है कि संवाद और पारदर्शिता के माध्यम से श्रमिकों की शिकायतों का समाधान किया जा सकता है।

भाकपा-माले की प्रमुख मांगों में एजेंसी, ठेका और आउटसोर्सिंग व्यवस्था की समीक्षा, नियमित प्रकृति के कार्यों से ठेका प्रथा समाप्त करना, पात्र श्रमिकों को स्थायी रोजगार देना, महीने में कम से कम 26 दिन काम उपलब्ध कराने की मांग, पूरी निर्धारित न्यूनतम मजदूरी का भुगतान, एजेंसियों के भुगतान की निष्पक्ष जांच तथा श्रमिकों को सामाजिक सुरक्षा का लाभ सुनिश्चित करना शामिल है।

रौशन कुमार ने कहा कि श्रमिकों के साथ न्याय करना और उन्हें सम्मानजनक रोजगार उपलब्ध कराना प्रशासन की प्राथमिकता होनी चाहिए। अब देखना होगा कि विश्वविद्यालय प्रशासन इन मांगों पर क्या कदम उठाता है और श्रमिकों की समस्याओं के समाधान के लिए किस प्रकार की पहल करता है। फिलहाल, भाकपा-माले ने स्पष्ट कर दिया है कि श्रमिकों के अधिकारों और रोजगार की सुरक्षा का सवाल उसके लिए महत्वपूर्ण है तथा मांगों पर सकारात्मक कार्रवाई नहीं होने की स्थिति में आंदोलन किया जाएगा।

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