हजारों साल पहले क्या हुआ, यह कैसे पता लगाएँ?
कल क्या हुआ था? यह जानने के लिए हम रेडियो, टेलीविजन या फिर अखबार की मदद लेते हैं। दस-बीस साल पहले क्या हुआ—यह हम अपने माता-पिता, दादा-दादी या नाना-नानी से जान लेते हैं। लेकिन हजारों वर्ष पहले क्या हुआ था? इसकी जानकारी हम इतिहास से प्राप्त करते हैं। यथा—हमारे पूर्वज कौन थे? वे कहाँ रहते थे? वे क्या खाते थे और कैसे कपड़े पहनते थे? अतीत से लेकर वर्तमान तक की जानकारियाँ हमें इतिहास से ही मिलती हैं।
### अध्ययन का काल निर्धारण कैसे करें?
अतीत से लेकर वर्तमान तक विभिन्न घटनाओं का तिथि क्रमानुसार अध्ययन एवं विश्लेषण ही इतिहास का विषय है। इस काम में आसानी के लिए इतिहास को काल खण्डों में बाँटा जाता है। सामान्यतः तीन कालखण्ड निर्धारित किए जाते हैं—प्राचीन, मध्य एवं आधुनिक। किन्तु यह ध्यान रखना आवश्यक है कि ऐतिहासिक प्रक्रिया निरन्तर चलती रहती है और यह विभाजन इस प्रक्रिया में कहीं भी बाधा नहीं बनते।
प्रत्येक ऐतिहासिक युग की अपनी विशेषताएँ होती हैं। भारत में प्राचीन काल मानव जाति के आरंभिक क्रियाकलापों से आठवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध (700–750 ई०) तक निर्धारित किया जाता है। इसके आरंभिक चरण को पूर्व-ऐतिहासिक काल भी कहा जाता है, क्योंकि उस युग की घटनाओं का कोई क्रमबद्ध लिखित इतिहास उपलब्ध नहीं है। इस काल में मनुष्य ने आग एवं पहिया का उपयोग सीखा, खेती एवं पशुपालन सीखा और इसी समय गाँव एवं कस्बों तथा शहरों का विकास हुआ। छठी शताब्दी ई.पू. से सुसंगठित राज्यों का निर्माण आरम्भ हुआ और कालान्तर में विशाल साम्राज्यों की स्थापना हुई। छठी शताब्दी ई. तक आते-आते इन साम्राज्यों का विघटन होने लगा और पुनः छोटे-छोटे राज्य अस्तित्व में आने लगे।
आठवीं शताब्दी के मध्य 750 ई० तक ये राज्य धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगे, परन्तु व्यापार एवं नगरों का फिर से विकास हुआ। ग्यारहवीं शताब्दी तक नये सैन्य साधन और उन्नत उत्पादन तकनीक का विकास हुआ। इस्लाम के माध्यम से नई विचारधारा का भारत में आगमन हुआ और पुनः भारत में विशाल साम्राज्यों का गठन संभव हुआ। सांस्कृतिक समन्वय भी हुआ और सामाजिक सामंजस्य भी स्थापित हुआ। यह प्रक्रिया अठारहवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में पुनः पतनशील अवस्था में आ गयी। इसी के साथ दूसरा प्रमुख काल या मध्यकाल का अन्त हुआ।
आधुनिक काल का प्रारंभ अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध से हुआ, जब पश्चिमी देशों के द्वारा नए विचार और प्रशासनिक व्यवहार भारत में लाए गए। इससे शिक्षा, स्वास्थ्य, संचार-व्यवस्था एवं आवागमन में विशेष प्रगति हुई। दुर्भाग्यवश यह नई प्रशासनिक व्यवस्था विदेशियों द्वारा स्थापित की गयी थी, जो हमारे देश के आर्थिक संसाधनों का लाभ प्राप्त करना चाहते थे। इस व्यवस्था को ‘उपनिवेशवाद’ कहते हैं। इसके अन्तर्गत किसी उन्नत देश द्वारा किसी दूसरे कमजोर देश पर अधिकार कर उसका आर्थिक शोषण करता है। स्वाभाविक था कि भारतीयों में इसके विरुद्ध एक चेतना जगी। उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध से भारत में इस औपनिवेशिक सत्ता के विरुद्ध राष्ट्रीय आन्दोलन सक्रिय हुआ जो सत्य और अहिंसा के सिद्धान्तों से प्रेरित रहा। सन् 1947 में भारत को आजादी मिली और एक नया संविधान बना। इस संविधान के द्वारा जनता को अपने प्रतिनिधियों द्वारा शासन का अधिकार मिला। यही काल भारत के आधुनिक इतिहास का प्रतिनिधित्व करता है।
### मानव जाति के इतिहास को हम कैसे जानते हैं?
मानव जाति के इतिहास की जानकारी हमें कई स्रोतों से मिलती है। इनमें से एक स्रोत उत्तरीय लेखी गई पुस्तकें हैं। इन पुस्तकों को हम हस्तलिखित पढ़ते हैं। इनमें राजाओं के शासन काल, धार्मिक विचार एवं मान्यताएँ, औषधियों तथा विज्ञान आदि सभी प्रकार के विषयों की चर्चा की जाती है। ये पुस्तकें कभी ताड़ के पत्तों से लिखित होने के कारण ‘पाण्डुलिपि’ कही जाती हैं। ये पाण्डुलिपियाँ प्रायः ताड़पत्रों अथवा भोजपत्रों पर लिखी मिलती हैं। बहुत कम पाण्डुलिपियाँ अब तक हो चुकी हैं। कुछ पुस्तकालयों एवं संग्रहालयों में सुरक्षित हैं। पुरातत्व की खुदाई द्वारा लाखों एवं पालीग्राफिक शिलालेखों का गोपनीय तथा संरक्षण संबंधित पुरातत्व के संग्रहालयों में सुरक्षित हैं। संगमरमर और अन्य पत्थरों में आप पाण्डुलिपियाँ देख सकते हैं। इसके अतिरिक्त लिखित स्रोतों में अनेक महाकाव्य, कविताएँ एवं नाटक आदि हैं। इनमें से कुछ संस्कृत भाषा में लिखे गए हैं जबकि अन्य प्राकृत, तमिल एवं कन्नड़ आदि में हैं।
हम अतीत की जानकारी अभिलेखों से भी प्राप्त करते हैं। ‘अभिलेख’ पत्थर अथवा धातु की सतहों पर खुदाई किए गए होते हैं। इन अभिलेखों में राजाओं तथा अन्य महत्वपूर्ण लोगों के आदेश और उपलब्धियाँ वर्णित हैं। इन्हें वैसी जगहों पर लगाया जाता था।
जहाँ अधिक से अधिक लोग आते-जाते थे। ताकि अधिक से अधिक लोग उसे देख सकें और उसमें लिखित आदेशों का पालन कर सकें।
इसके अतिरिक्त अतीत में बनाई गयी एवं इस्तेमाल में लायी गयी वस्तुओं के माध्यम से भी हम अतीत की जानकारी प्राप्त करने में सफल होते हैं। ऐसी वस्तुओं में पत्थर एवं ईंटें, धातु के आभूषण, औजार, हथियार, बर्तन, आभूषण, मूर्तियाँ, चित्र और सिक्के आते हैं। ये वस्तुएँ पुरातात्विक स्रोत के रूप में जानी जाती हैं अर्थात् काफी प्राचीन होने के कारण इनके अवशेषों को जमीन की खुदाई करके प्राप्त किया जाता है। पुरातात्विक वस्तुओं का अध्ययन करनेवाला व्यक्ति ‘पुरातत्वविद्’ कहलाता है।

खुदाई में मिली वस्तुओं के विश्लेषण में समय का निर्धारण करना बहुत महत्वपूर्ण है। वैसे तो समय निर्धारण के लिए कई विधियाँ अपनायी जाती हैं लेकिन जो सामान्यतः प्रचलित है, वह है रेडियो कार्बन विधि या ‘कार्बन-14 पद्धति’।
### रेडियो कार्बन विधि :
तिथि निर्धारण का यह काम भौतिकशास्त्री करते हैं। सारी वस्तुओं में एक प्रकार का रेडियोधर्मी पदार्थ होता है जो कार्बन-14 कहलाता है। रेडियोधर्मी वे पदार्थ होते हैं जिनमें से निश्चित दर में छोटे-छोटे कण निकलते हैं। जब मनुष्य पशु या पौधा जिन्दा होते हैं तब वो जिस मात्रा में वायुमण्डल से कार्बन-14 लेते हैं, उसी मात्रा में रेडियोधर्मिता के कारण मरने के बाद उसे खो देते हैं। जब कोई मर जाता है तब वह वायुमण्डल से कोई कार्बन-14 नहीं लेता है। यद्यपि वह इसे एक निश्चित दर पर खोता रहता है। भौतिकशास्त्री इसी निहित कार्बन-14 की मात्रा का पता लगाकर उस जीव की आयु निश्चित करते हैं।
### तिथियों का मतलब :
प्राचीन काल में हमारे देश में तिथियों की गणना विक्रम संवत और शक संवत के आधार पर होती थी, लेकिन अब पूरे विश्व में एक मानक के रूप में तिथियों की गणना मुख्यतः ईसाई धर्म प्रवर्तक ईसा मसीह के जन्म की तिथि से की जाती है। इसमें ईसा मसीह के जीवन को शून्य वर्ष माना जाता है। उनके जन्म के पूर्व की सभी तिथियों के आगे अंग्रेजी में बी. सी. (बिफोर क्राइस्ट) और हिन्दी में ई.पू. (अर्थात ईसा पूर्व) लिखते हैं। इसी प्रकार ई. की शुरुआत उनके जन्म के वर्ष से है। जैसे यदि कहीं 2009 ई. (ए.डी.—एनो डोमिनी) लिखा देखते हैं तो इसका तात्पर्य ईसा मसीह के जन्म के बाद के 2009वें वर्ष से है। इसी प्रकार यदि वही 2500 ई.पू. लिखा हुआ मिलता है तो इसका अर्थ है ईसा मसीह के जन्म के 2500 वर्ष पहले का समय।
तिथि निर्धारण को इस ग्राफ से समझा जा सकता है—
ई.पू. (B.C.) ईसा मसीह का जन्म — सन् ई. (A.D.)
प्रश्न-उत्तर
प्रश्न 1. रेडियो कार्बन विधि क्या है?
उत्तर: रेडियो कार्बन विधि या कार्बन-14 पद्धति खुदाई में मिली पुरानी वस्तुओं तथा जीवों के अवशेषों की आयु निर्धारित करने की एक विधि है।
प्रश्न 2. पुरातत्वविद् किसे कहते हैं?
उत्तर: प्राचीन वस्तुओं, स्मारकों तथा उनके अवशेषों का अध्ययन करने वाले व्यक्ति को पुरातत्वविद् कहते हैं।
प्रश्न 3. पुरातात्विक स्रोत क्या हैं?
उत्तर: प्राचीन काल की वस्तुएँ, जैसे पत्थर, ईंटें, आभूषण, औजार, हथियार, बर्तन, मूर्तियाँ, चित्र और सिक्के, पुरातात्विक स्रोत कहलाते हैं।
प्रश्न 4. अभिलेख किसे कहते हैं?
उत्तर: पत्थर या धातु की सतह पर खुदाई करके लिखे गए लेखों को अभिलेख कहते हैं।
प्रश्न 5. इतिहास जानने के प्रमुख स्रोत कौन-कौन से हैं?
उत्तर: इतिहास जानने के प्रमुख स्रोत हैं—हस्तलिखित पुस्तकें, अभिलेख और पुरातात्विक वस्तुएँ।
प्रश्न 6. कार्बन-14 विधि से आयु का निर्धारण कैसे किया जाता है?
उत्तर: जीवों के अवशेषों में बचे कार्बन-14 की मात्रा का अध्ययन करके उनकी आयु का अनुमान लगाया जाता है।
प्रश्न 7. ई.पू. (B.C.) का क्या अर्थ है?
उत्तर: ई.पू. का अर्थ है ‘ईसा पूर्व’, अर्थात ईसा मसीह के जन्म से पहले का समय।
प्रश्न 8. ई. (A.D.) का क्या अर्थ है?
उत्तर: A.D. का अर्थ Anno Domini है। इसका प्रयोग ईसा मसीह के जन्म के बाद के वर्षों के लिए किया जाता है।
प्रश्न 9. प्राचीन काल में भारत में तिथियों की गणना किन संवतों के आधार पर होती थी?
उत्तर: प्राचीन काल में भारत में तिथियों की गणना विक्रम संवत और शक संवत के आधार पर होती थी।
प्रश्न 10. इतिहास के अध्ययन में तिथि निर्धारण क्यों महत्वपूर्ण है?
उत्तर: तिथि निर्धारण से प्राचीन घटनाओं और वस्तुओं के समय का पता चलता है तथा घटनाओं के क्रम को समझने में सहायता मिलती है।









